शनिवार, 17 दिसंबर 2016

उदाहरणों का प्रयोग

बचपन में बच्चों को प्रेरित करने के लिए कक्षा में शिक्षक अक्सर एक कहानी का उदाहरण देते थे कि ‘एक लड़के से उसके पिता ने जब परीक्षा का परिणाम जानने का प्रयास किया तो वह अपने वर्ग के कई छात्रों का नाम लेकर कहने लगा कि ये सभी फेल हो गए हैं। पिता ने पूछा कि तुम अपना परिणाम बताओ… मैं तुम्हारे बारे में जानना चाहता हूं। इस पर बच्चे ने बड़ी मासूमियत से कहा कि जब ये सभी फेल हो गए तो मैं कैसे पास हो सकता हूं।’ बचपन की यह कहानी भले ही गुदगुदाने वाली थी और शिक्षक भी हंसी-हंसी में कुछ प्रेरणा जागृत करने का प्रयास करते रहे हों, लेकिन इसके संदर्भ गहरे हैं। इस तरह के उदाहरण हमें अक्सर सुनने को मिलते हैं। कई जगह हम भी कोई उदाहरण देकर लोगों को अपनी बात समझाने की कोशिश करते हैं। धीरे-धीरे यह लोगों का औजार बनता जाता है।
उदाहरणों का प्रयोग औजार के रूप में होने लगे तो यह घातक और अनुचित है। बैंकों में लगे कतारों को लेकर राजनीतिक और गैर-राजनीतिक लोगों द्वारा दिए गए उदहारण को ही लीजिए। कोई सैनिकों की मुश्किलों का उदाहरण देकर बैंकों के आगे की भीड़ को सब्र का पाठ पढ़ा रहे हैं, तो कोई आजादी की लड़ाई में शहीद हुए लोगों से तुलना कर उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि कष्टों और संघर्षों से ही आजादी नसीब होती है। राजनीति के कई धुरंधर कोई न कोई उदाहरण का प्रयोग कर अपना हित साधते नजर आ रहे हैं। पांच सौ और हजार रुपए को बंद किए जाने पर कई नेताओं का उलटा-सीधा बयान असंवेदनशील और गंभीर हैं। सेना का पूरा जीवन संघर्ष का होता है। बेशक उनके संघर्षों से प्रेरणा लेनी चाहिए। लेकिन एक दूसरा पहलू भी है कि सेना का जीवट और संघर्ष ही उन्हें असैनिक नागरिकों से अलग करता है। उन्हें संघर्षों का और मुश्किल हालात से जूझने के लिए कई तरह के प्रशिक्षण दिए जाते हैं, ताकि उनका मनोबल कम न हो, वे हमेशा उर्जावान रहे।
लेकिन हमारे समाज की आम हकीकत क्या है? एक साधारण नागरिक को सड़क पर सही तरीके से चलने तक के लिए प्रेरित नहीं किया जाता है, तो वे विषम परिस्थितियों में संयम कहां से बरतेंगे! अपने देश में कई ऐसे उदाहरण हैं कि केवल संयम खोने से कई हादसे हुए हैं और हजारों लोगों की मौत हुई है। इन उदाहरणों और तुलना करने वाले लोगों का ध्यान इस प्रश्न पर भी जाना चाहिए कि कष्ट और संघर्ष हमेशा आम लोगों के हिस्से ही क्यों आते हैं! महंगाई से लेकर प्राकृतिक आपदा की मार झेलें आम लोग, सीमा पर शहीद हों उसी साधारण लोगों की संतानें! सवाल है कि नेता और बड़े अफसर, बड़े व्यवसायी संघर्षों में क्यों नहीं होते या दिखते? आज जब पूरा देश कतारों में खड़े होकर अपने द्वारा जमा पैसे निकालने के लिए तकलीफें सह रहा है तो इन नेताओं के बेसुरे बोल इन्हें आहत करने पर तुले हुए हैं। हथियार रूपी उदाहरण आम इंसानों का सीना ही छलनी करते हैं।
उदाहरण हमारी संवेदनाओं को कुरेदते हैं। जो जख्म हमारे सत्ता में बैठे लोग हमें देते हैं, सत्ता के करीबी लोग कोई उदाहरण गढ़ लेते हैं और हमारी जख्मों पर एक लेप चढ़ा देते हैं। यह लेप दर्द तो जरूर कम करता है, लेकिन घाव भरता नहीं। वह अंदर ही अंदर गहरा होता जाता है। जब तर्क कमजोर पड़ने लगते हैं तो लोग उदाहरणों का प्रयोग करते हैं। इन दिनों राजनीति और सामाजिक गतिविधियों में तर्क से ज्यादा कुतर्क से अपनी बात मनवाने का प्रचलन बढ़ गया है। मनगढ़ंत उदाहरण और झूठे तर्कों के सहारे सही को गलत और गलत को सही करने का खेल चल पड़ा है। इस खेल में आम लोगों से लेकर नेता अफसर और व्यवसायी सभी एकरूपता से लगे हुए हैं।
कई बार उदाहरणों का प्रयोग तथ्यों को छिपाने के लिए भी किया जाता है। संसाधन की अनुपलब्धता या हमारी कमजोर तैयारी को छिपाने के लिए उदाहरणों का प्रयोग कर आम लोगों के दिमाग पर एक परदा डाल दिया जाता है। एक सभ्य और संवेदनशील मुल्क में ऐसे उदाहरणों और तुलना की राजनीति से हम आम भावना से खेल रहे हैं। भारत की सभ्यता रही है दूसरों की तकलीफों को उसे बिना आभास हुए दूर करने की। लेकिन इन नेताओं और किसी खास नेता के महिमामंडन में लगे लोगों द्वारा की गई टिप्पणी से न केवल पीड़ित व्यक्ति के जख्म हरे हुए हैं, बल्कि उनके भीतर नफरत को भी हवा मिल रही है। पीड़ा में जब कोई हो तो उसे सहायता की जरूरत होती है, न कि उपदेश के। इस तथ्य को समझने की जरूरत है।

दर्द सहने की प्रायोजित चिंता

दर्द सहने की प्रायोजित चिंता का विकास हमारी सुदीर्घ परंपरा में रहा है। हम परंपरा के आदी होने से पहले एक सोपानगत यात्रा तय करके आते हैं। सहनशीलता की अमानुषिक पराकाष्ठा हमें संस्कृतिवाद की घुट्टी के प्रारूप में मिली कि इसका रंग असर करता गया और हम सांस्कृतिक नशे का शिकार हो गए। देश की आधी आबादी जिस रंग-रोगन में डूब कर प्रतिष्ठा के गोते लगा रही है, पर्व और त्योहारों पर भूखों मर कर उपवास के परचम लहरा रही है, नाक-कान छेदा रही है, तरह-तरह की धातुएं ढो रही है, यह सब भी दर्द के हद से गुजरे हुए सांस्कृतिक लक्षण हैं। ढोना हमारी ग्रंथि में शामिल हो चुका है। हमारी आध्यात्मिकता में इसके लबरेज पाखंड नग्नता लिए अभिनंदित होते रहे हैं। असमानता के कठोर आघातों से लहूलुहान हमरी शास्त्रीय दहाड़ लगातार यह बताती आई है, सहने की क्षमता का विकास करो। तुलसी ने भी अपनी मानस वाली किताब में लिखा है कि तप बहुत ऊंची चीज है। इतनी ऊंची चीज कि लगभग खत्म होने के कगार तक खुद को तपाओ।
तुलसी कोई उबीधा बात नहीं कह रहे थे। इस पर हमारे स्वदेशी दर्शन संस्कृत काल से ही दीपक राग गाते आ रहे थे। देश की जनता तप करने में तब इतनी व्यस्त थी, इसके प्रमाण आज इक्कीसवीं सदी के मानव मस्तिष्क की सामाजिक जड़ता में प्रमाणित है। जब भी ऐसे तप होते थे शारीरिक अक्षमताएं बढ़ जाती थीं और देह स्वभावहीन हो जाती थी। भोजन और पानी शरीर की आवश्यक नियमितता के अनुकूल नहीं मिलते थे। शारीरिक और मानसिक रोग जड़ीभूत होते गए, ग्रंथियां बनती गर्इं, संततियां सांस्कृतिक होती गर्इं। माना कि मनुष्य तप करके, शरीर को ठिकाने लगाते हुए अगर शक्ति यानी पदवी पा भी लिया तो यह तय है कि वह स्वाभाविक नहीं रहेगा। मानसिक और शारीरिक कमजोरियां उसे कुंठित जरूर बना देंगी। इन परिघटनाओं से ही हमारी सामाजिकता में जड़ आध्यात्मिकता का विकास हुआ।
आदिम युग से हम शौर्य और शृंगार के ज्वलंत लोभी रहे, हमने समाज में सहजता नहीं बरती। हमारा लोभ कुंठा की संस्कृति रचता गया, जिसे हमारी पुश्तैनी बीमारी सराहते हुए नहीं थकती। हमारी परंपरा इतनी दागी हुई कि जो दिखता है वह झूठ है करारती गई। यह हमारी तपती हुई सच्चाई है। इसी संस्कृति की भांग खाए हमारी संततियां हराम के मिष्ठान्न पर डाका डालने में मशगूल होती गर्इं। शास्त्रीयता के एजेंट इसी पक्ष में अपने दार्शनिक सिद्धांत खड़े करते गए। यह बात सोचने की है कि राजतंत्र में बड़े से बड़े दर्द झेल कर ज्यादातर जनता ऐयाश राजा के खिलाफ बगावत क्यों नहीं करती थी! कारण हमारी व्यवस्था लगातार दर्द सहने के आसान तरीके सीख रही थी। जनता को यहां तक बताया जा चुका था कि कर्म करते रहो फल की इच्छा भी न रखो।
आज बेरोजगारी के दौर में हम तप कर रहे हैं, सिर पीट-पीट कर रट रहे हैं, कागद गोद-गोद कर योग कर रहे हैं। इस लोकतंत्र में हम तपस्या के हठ आसान लगा रहे हैं। तीस से चालीस तक पहुंचते हुए हम खुद को अपराधी करारने वाली जीवन पद्धति में जी रहे हैं। विभागों में स्वीकृत पद भी नहीं भरे जा रहे हैं और हम अपनी कुंठा में आरक्षण पर उपदेश धांगने में महारत हासिल कर रहे हैं। हमारी मानसिकता सत्ता से दर्द सहने की अविकल आदी हो चुकी है। आजकल हमसे कहा जा रहा है आप देश के लिए इतना भी दर्द नहीं सह सकते! क्या हम दर्द को पहचानने लगे हैं? हमें बताया जा रहा है देश के जवान सीमा पर जीरो डिग्री तापमान में बंदूक लिए तैनात हैं और तुम दिन भर बैंक में लाइन लगा कर नहीं खड़े हो सकते! हमें यह पहचानने की जरूरत है कि हमसे यह कौन कह रहा है। यह बहुविकल्पीय प्रश्न नहीं है। इसके जवाब सबको पता हैं। हमें जवाबों से भटकाया जा रहा है। यह रियाज भर है- कुंठा की ओर लौटो, तप की ओर लौटो, पौराणिक जहालत की ओर लौटो। लौटो कि जैसे कुछ नहीं बदला, जैसे तुम दर्द की हद से गुजर चुके हो। लौटो और शहंशाह से कह दो हमें दवा में दर्द चाहिए। कल एक पोस्टर देख रहा था- ‘भक्त को दर्द नहीं होता।’ लेकिन यह बताना आज कितना खतरनाक है।
जो दवा में दर्द मांग रहा हो उसे सहलाना कितना घातक है। हमारा इतिहास इस तथ्य का गवाह है कि जब भी कोई चीजों की वास्तविकता की देख-परख करने वाला बुद्धिमान व्यक्ति जनता के बीच यह कहने की कोशिश करता है, तो सजा पाता है, देशद्रोही करार दिया जाता है। सूली पर टांग दिया जाता है, तेज आग की लपटों के हवाले कर दिया जाता है, हाथियों से कुचलवा दिया जाता है। और जो अपराधों के जंगल में सत्ता का साथ तुकबंदियां करते, चापलूसी में खूंखार की पूंछ सहलाते हैं, हत्यारी हुकूमत में राग मल्हार गाते हैं, दवा में दर्द बेचने का साहित्यिक दावा करते हैं, वे सम्मानित होते हैं। लेकिन सभ्यता के इतिहास में इनके नाम गायब हो जाते हैं।

विचारों की स्वतंत्रता

एक सभ्य समाज में विचारों की स्वतंत्रता की अहमियत कितनी है, इससे हम सब वाकिफ हैं! सभी स्त्री-पुरुष के अपने-अपने अलग विचार और मान्यताएं होती हैं। किसी के विचार किसी पर जबरन थोपे नहीं जा सकते। अगर ऐसा होता है तो यह विचार स्वातंत्र्य को छिनने या दबाने जैसा है। विचार सिर्फ मन में उभर कर रह जाते हैं और व्यक्त नहीं किए जाते तो उनका महत्त्व उसी व्यक्ति तक सीमित रह जाता है। लेकिन व्यक्त किए गए विचारों का महत्त्व यकीनन ज्यादा है, क्योंकि उनका प्रभाव उस व्यक्ति से संबंधित सभी लोगों और समाज पर भी पड़ता है। अगर कोई स्त्री या पुरुष अपने विचारों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करे और उसमें खुद को ढालते हुए कोई कार्य करना चाहे तो जाहिर है कि कार्य के परिणाम की जिम्मेदारी उसकी अपनी ही होती है। इसीलिए अपने विचारों पर अमल करना मजबूत इरादे वाले और धैर्यशील लोगों का ही काम है। यह जरूरी नहीं कि आपके संपर्क में आने वाले सभी लोग, आपके विचारों से सहमत हों। आपके विचार जान कर आपा खोने वाले, परिणाम से डरने वाले, जानबूझ कर आपका विरोध करने वाले और आपका मजाक उड़ाने वाले बहुत से लोग मिल जाएंगे। जब आप अपने विचारों पर अमल करने के लिए कदम बढ़ाने लगें तो आपके रास्ते में कई तरह की रुकावटें डालने वाले लोग भी आपको मिल जाएंगे। ऐसे में मन को दृढ़ बना कर आगे बढ़ना या अपने आप को रोकना आपका स्वतंत्र निर्णय है।
पिता-पुत्र के भाई-भाई के और पति-पत्नी के विचार भी कई मामलों में भिन्न हो सकते हैं। ऐसे में आपस में मनमुटाव और झगड़े भी हो सकते हैं। पिता-पुत्र या भाई-भाई के भिन्न विचारों को लेकर होने वाले झगड़े या मनमुटाव को हमारा समाज सामान्य रूप में स्वीकार कर लेता है। लेकिन पति-पत्नी के भिन्न विचारों को लेकर हुए झगड़े और मनमुटाव को समाज टेढ़ी नजर से देखता है। पत्नी के विचार पति से भिन्न होने की बात समाज बर्दाश्त नहीं कर पाता। अगर पत्नी अपने स्वतंत्र विचारों पर अमल करती है और पति उसका विरोध कर रहा है, तो पैदा होने वाली पारिवारिक समस्या के लिए जिम्मेदार पत्नी ही मानी जाती है।
आज से कुछ दशक पहले इसी कारण को लेकर विवाहित स्त्रियां अपने विचारों को व्यक्त करने से डरती थीं। वे सोचती थी कि कहीं पति ने विरोध जताया तो गृहस्थी छिन्न-भिन्न होने में देर नहीं लगेगी। यही सोच कर वह मन मार कर रह जाती थी। ऐसे में परिवार के अन्य सदस्यों का साथ होना तो असंभव-सा था। उसके अपने-अपने अभिभावक और माता-पिता भी उसे पति के विचारों के विरुद्ध कदम उठाने से साफ तौर पर मना कर देते थे। उसे वोट भी उसी पार्टी और उम्मीदवार को देना पड़ता था, जिसे पति पसंद करता था! अपनी सोच या अपने स्वतंत्र विचारों को वह कार्यान्वित नहीं कर सकती थी।लेकिन वक्त ने करवट बदला। पाश्चात्य संस्कृति के समाज पर कुछ बुरे प्रभाव अवश्य पड़े, लेकिन एक अच्छा प्रभाव भी पड़ा। महिलाओं ने अपने आप को कमजोर और लाचार समझना छोड़ दिया। अपने बलबूते पर काम करने के लिए मन को मजबूत बना लिया और अपने स्वतंत्र विचारों पर अमल करना भी सीख लिया। जैसे ज्योत से ज्योत जलाई जाती है, वैसे ही एक स्त्री दूसरी स्त्री की प्रेरणा बनती गई। इससे समाज में भी जागृति आ गई। शुरू-शुरू में सामाजिक स्तर पर जरूर इसका विरोध हुआ। लेकिन इस बीच एक अच्छी बात यह हुई कि कुछ पुरुषों ने अपनी पत्नी का साथ देकर एक अनुकरणीय उदाहरण समाज के सामने रखा। इसके बावजूद कि पत्नी के विचार उनके विचारों से नहीं मिलते थे।
ऐसे उदाहरणों ने यह भी साबित किया कि इससे पारिवारिक शांति में कोई खलल नहीं पड़ती। इसका ताजा उदाहरण बच्चन परिवार का है! प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन राजनीतिक रूप से अपनी पसंद और समझ से किसी खास पार्टी के पक्ष में कोई राय रखते हों, उनकी पत्नी जया बच्चन उनसे इतर राय रखती हैं। जया के अपने अलग विचार हैं। अपने लिए उन्होंने अलग कार्यक्षेत्र चुना है। हो सकता है कि अमिताभ बच्चन अपनी पत्नी जया बच्चन के राजनीतिक पक्ष और विचारों के समर्थक नहीं हों, लेकिन वे उनका कभी विरोध करते नहीं दिखते, बल्कि जरूरत पड़ने पर उनकी सहायता भी करते हैं। इसका उनके निजी संबंधों और जीवन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ा है।यह तो एक मशहूर हस्ती का उदाहरण है। लेकिन सामान्य लोगों के बीच भी ऐसे किस्से आम हो रहे हैं जिसमें पति या पत्नी के सोचने-समझने, विचार और काम के क्षेत्र भिन्न हैं, लेकिन उनके निजी संबंध सहज हैं। दरअसल, विचारों की अभिव्यक्ति की आजादी सभी के लिए जरूरी है। समाज या राजनीति, किसी भी क्षेत्र में सत्ताधारी पक्ष की वह हर बात मान लेने की जरूरत नहीं है, जो आपको उचित नहीं लगती हो। विचारों की आजादी सबकी अपनी है

पुराने दौर में घड़ियां

जाने कितने महीनों बाद घड़ी को हाथ में बांधा। मोबाइल ने तो घड़ियों का काम ही तमाम कर दिया लगता है। पुराने दौर में घड़ियां अगली पीढ़ियों तक चलती रहती थीं। कभी-कभी तो लालच भी मिलता था कि इस बार बढ़िया पढ़ोगे तो घड़ी इनाम में मिलेगी। और मिलती भी थी। ‘आपको क्या लगता है कि घड़ियों को सुधारने के धंधे में अब उतना जोर नहीं रहा?’ इतना कहना था कि उसने कहा- ‘नहीं साहब, मुझे तो बहुत काम मिलता है। देखो, सुबह से रात तक खड़े-खड़े ही निकल जाता है। इस पूरे बाजार में मेरा नाम चलता है। सबसे पुराना घड़ीसाज हूं यहां का।’ उसकी दुकान में बहुत सारी पुरानी और नई घड़ियां शो-केस में रखी थीं। दीवार पर भी ढेर सारी दीवार-घड़ियां टंगी हुई थीं। बची हुई खुली घड़ियों और उनके बीच की खाली जगह में धूल यह बयान कर रही थी कि अनेक रोजगार की तरह बहुत से काम खत्म हो रहे हैं। घड़ीसाज भी अब बहुत ही कम बचे हैं। दरअसल, हुआ यों कि छुट्टी का उपयोग करके वक्त को घर के कई दिनों से रुके हुए कामों में लगाया। तो बच्चों और अपनी घड़ियों को लेकर घड़ी की दुकान पर पहुंचा और दुकानदार से कहा- ‘आज मैं घर की सारी घड़ियां निकाल कर लाया हूं।’ घड़ीसाज की दुकान के पास ही एक टीवी सुधारने की दुकान है। वहां पर भी कई पुराने सीआरटी टीवी धूल खा रहे हैं और उस दुकान के मालिक की हालत भी वैसी ही है। दौर बदल रहा है। आजकल इस्तेमाल करो और फेंको के जमाने में रेडियो, टेपरिकार्डर देखने को भी कम मिलते हैं।
हमारे घड़ीसाज ने कहा कि थोड़ी देर रुकें, कोशिश होगी कि अभी ही चारों घड़ियों को ठीक कर दूं। इस बीच रमेश भाई याद आए। तब मैं आठवीं-नौवीं में था और वे अपनी पढ़ाई पूरी करके, नहीं… शायद अधूरी छोड़ कर घड़ियों को सुधारने का काम करने लगे थे। परिवार बड़ा था, कमाई सीमित। नियमित कमाने वाले सिर्फ उनके पिताजी थे। जब भी उससे आगे पढ़ाई कि बात करता तो उनकी बड़ी-बड़ी आंखें छलक जाती थीं। वे शायद आंसू ही रहते थे, लेकिन वे कहते थे कि इतना बारीक काम करने से उनकी आंखों से पानी झरने लगता था। उनके पास जब भी जाता था तो कोई न कोई घड़ी वे खोल कर बैठे मिलते। छोटे गिलास की शक्ल का एक लेंस होता था जो घड़ी के बारीक पार्ट को देखने के काम आता था। मुझे लगता था कि वे मुझे भी यह काम सिखा दें तो मैं भी इसी तरह लेंस लगा कर काम करूंगा। कोई भी घड़ी खोल कर देखते ही वे बता देते थे कि यह घड़ी ठीक होगी कि नहीं। वे इसलिए भी प्रभावित करते थे कि वे घड़ियों को तो सुधारते ही थे, साथ ही एक काम और करते थे। पास के ही छोटे डाकघर की डाक को बांध कर बड़े डाकघर में जमा कराना होता था और वहां से डाक लेने का भी काम था। हालांकि न तो वे डाक विभाग के कर्मचारी थे, न वहां पूरे समय रहते थे। उन दिनों डाक घरों में डाक को लाख से सील किया जाता था तो यह सील करने का तरीका भी मुझे बहुत ही आकर्षक लगता था।
वक्त बीतता गया। मैं अपनी पढ़ाई में उलझ गया। शहर से बाहर गया। वापस आया तब तक रमेश भाई का कोई अता-पता नहीं था। लोग कहते थे कि उनके पिताजी रिटायर हो गए और तमिलनाडु के अपने गांव चले गए। उन दिनों फेसबुक वगैरह नहीं था। खैर-खबर एक दूसरे से मिल कर और चिट्ठियों के बहाने ली जाती थी। डाक घर गया तो वहां भी उन्हें जानने वाला कोई नहीं मिला।घड़ी वाले बड़े उस्ताद की दुकान पर पहुंचा तो वह दुकान तोड़ कर कुछ शोरूम बन गए थे। बड़े उस्ताद के बारे में किसी से पूछने की हिम्मत नहीं हुई। आखिर उसने कहा- ‘आपकी तीन घड़ियां ठीक हो गई हैं। एक कल मिल सकेगी।’ मैंने कहा कि ठीक है, कितने पैसे हुए तो उसने दो सौ तीस रुपए बतए। साथ खड़ी मेरी पत्नी ने कहा कि कुछ कम करने के लिए कहो। इतनी घड़ियां ठीक करवाई हैं। मेरा मन उस घड़ीसाज में रमेश भाई को देख रहा था… उनके उस्ताद को देख रहा था! खत्म होते जा रहे पुराने रोजगारों को देख रहा था। अपने उस दौर के सपने को देख रहा था, जब मैं ग्लासनुमा लेंस लगा कर अच्छा घड़ीसाज बना! खैर, घड़ीसाज ने जितने पैसे मांगे, उतने देकर चला आया। चार घड़ियों को ठीक करने और रमेश भाई के साथ बिताई तमाम घड़ियों को याद दिलाने के लिए पैसों के कोई मायने नहीं रह गए थे।

अपेक्षा का बोझ

अपेक्षा का बोझ
काफी अरसे बाद एक मित्र के घर गई तो उनसे बहुत सारी बातें हुई। बातचीत के दौरान ही उसकी छोटी बेटी भी वहां आ गई। मैंने उसका नाम पूछा। उसने चहकते हुए अपना नाम बताया- ‘पूर्वी’। इसके बाद मेरी मित्र ने एक बड़े अंग्रेजी माध्यम के स्कूल का नाम गर्व से लेते हुए कहा कि पूर्वी वहां पर पढ़ती है। मैंने भी इस बात पर खुशी जाहिर की। दरअसल, उस स्कूल में दाखिला लेना एक टेढ़ी खीर है। मैंने पूर्वी से प्यार से पूछा कि बताओ पूर्वी का मतलब क्या होता है! बच्ची ने कुछ देर तक इस बारे में सोचा और फिर कुछ कहने ही वाली थी कि इतने में उसकी मां ने बीच में ही कहा कि अरे बेटा, वह वाली कविता सुनाओ। वह तुम अच्छी सुनाती हो। बच्ची थोड़ी देर बिना किसी प्रतिक्रिया के वहां खड़ी रही । इस दौरान उसकी मां ने फिर से अपनी बात दोहराई की जल्दी सुनाओ… तुम अच्छी बच्ची हो न! बच्ची तुनक कर वहां से चली गई, यह कहते हुए कि मुझे नहीं सुनाना।
इस पर मेरी मित्र बच्ची से काफी नाराज हो गर्इं। कहने लगीं कि पता नहीं, ऐसा क्यों है… आजकल के बच्चे बोलते ही नहीं हैं। यों तो बहुत बोलती है, मगर जब कुछ सुनाने को बोलो तो पता नहीं, इसको क्या हो जाता है। उस दिन की बात के बाद मेरे मन में कई सारे सवाल उठने शुरू हो गए। दरअसल, इस तरह के उदाहरण हमें अक्सर ही घर-परिवार आस-पड़ोस में देखने-सुनने को मिलते रहते हैं। बड़ी उम्र के लोग अक्सर बच्चों से अपने अनुरूप ही व्यवहार करने की अपेक्षा रखते है। मसलन, ये करो, ये मत करो, वहां मत जाओ, यहां मत खेलो, धीरे बोलो, ज्यादा उछल-कूद नहीं करो..! पता नहीं हमलोग चाहते क्या हैं! कभी-कभी लगता है कि हम बच्चों से उनका बचपन ही छीन रहे है और बड़ों से अपेक्षा करते हैं कि वे अपने अंदर के बच्चे को मरने न दें। यह एक मुश्किल चुनौती है।
आमतौर पर हमारे घरों में सभी कामों के लिए स्थान तय होता है। जैसे बैठक कक्ष, रसोईघर, शयनकक्ष आदि। मगर बच्चों के लिए कोई खास जगह नहीं होती है। यह बात घर की परिधि से निकल कर स्कूल तक भी जाती है। लेकिन बच्चों को अपनी बात रखने की जगह न तो स्कूल में मिलती है और न घर में। ज्यादातर माता-पिता के पास घर में इतना समय नहीं होता कि वे उनकी बात को शांति से सुन सकें और यह समझ सकें कि बच्चा यह बात क्यों कह रहा है। जो बातचीत होती भी है तो सिर्फ निर्देश देने वाली। मसलन, जल्दी उठ जाओ, नाश्ता कर लो, ये काम जल्दी कर लो तो टॉफी देंगे, होमवर्क कर लो और अब सो जाओ! सब पहले से तय है।स्कूली पाठयक्रम और शिक्षण विधियां भी बच्चों को इसकी जगह दे पाने में विफल हैं। अगर कोई बच्चा स्कूल में प्रश्न पूछता है तो वह कमजोर समझा जाता है। दूसरी ओर, घर पर अच्छे बच्चे मां-पिता से ज्यादा सवाल-जबाव नहीं करते हैं। अगर ज्यादा कुछ पूछ लिया तो फिर वह ‘आज्ञाकारी’ बच्चा नहीं रहा। स्कूल में तो अनुशासन के नाम पर बच्चों के मुंह पर अंगुली रखने को कहा जाता है। सामान्यतया प्रश्न पूछना दोनों जगहों पर ही अच्छा नहीं समझा जाता। स्कूल में तो बच्चों को यह मान कर ही कुछ सिखाने की कोशिश की जाती है कि उसको पहले से कुछ नहीं आता है। जहां तक मेरा अनुभव कहता है, बच्चों को अपनी बात कहने की जगह कोई कहानी सुनाने के बाद ही होती है कि इस कहानी से क्या शिक्षा मिली। मगर यहां पर भी अपेक्षित उत्तर पहले से ही तय होते हैं।
बच्चा क्या सोचता है, वह क्या चाहता है, वह क्या करना चाहता है, इसका ध्यान रखना किसी को जरूरी नहीं लगता है। शायद इसलिए कि हमें यह बात महत्त्वपूर्ण नहीं लगती है। सवाल है कि ऐसे में बच्चे क्या करें! कुछ माता-पिता को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि हमारा बच्चा तो ऐसा करता है, मगर फलां बच्चा तो वैसा करता है! हम हर समय उसकी तुलना दूसरों से करते रहते हैं। बच्चों की इस तरह से अन्य बच्चों से तुलना उनके सहज विकास और जिज्ञासा को पल्लवित और पुष्पित होने से रोकती है। क्या यह संभव नहीं कि हम बच्चों को बच्चों की तरह देखें। उनकी बालसुलभ चेष्टाओं पर समय से पहले वयस्क होना न थोपें! हम उन्हें एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप देखें तो शायद उनको अपनी सहज संभावनाओं और क्षमताओं के साथ बढ़ने में मदद मिल सकती है।

नगद नारायण कथा-अह्म ब्रह्मास्मि


बेबाक बोलः नगद नारायण कथा-अह्म ब्रह्मास्मि
सत्ता जब ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह बात करने लगे कि हमें जो ठीक लगे वही करेंगे तो लोकतंत्र का आधार बनी आम जनता के पांव लड़खड़ाने लगते हैं।
आम जनता बनाम सत्ता के रिश्ते को पाश की पंक्तियां उधार लेकर बोलें तो जनता घास की तरह होती है और सत्ता के हर किए-धरे पर उग ही आएगी। लेकिन सत्ता जब ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह बात करने लगे कि हमें जो ठीक लगे वही करेंगे तो लोकतंत्र का आधार बनी आम जनता के पांव लड़खड़ाने लगते हैं। ज्यां द्रेज ने नोटबंदी से कालेधन पर काबू पाने की कवायद की तुलना खुले झरने के नीचे पोछा लगाने से की है। आज 40वें दिन भी हालात सुधार के नाम पर बस डिजिटल भुगतान की ही सलाह है। नोटबंदी से परेशान जनता और फैसले को जायज बता रही तटस्थ सरकार पर इस बार का बेबाक बोल।
इस साल मैन बुकर प्राइज से पुरस्कृत पॉल बेट्टी की किताब ‘द सेलआउट’ के नायक ‘मी’ को इस बात की खुशफहमी रहती है कि अमेरिकी समाज सबको जीने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराता है। नायक को लगता है कि महान अमेरिकी गणराज्य में महज अपनी काबिलियत के जरिए हर आम इनसान अपने सपने पूरे कर सकता है। ‘मी’ के अश्वेत पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा झूठे सपनों में और भ्रांतियों का शिकार होकर जिए। पिता अपने बेटे को अमेरिकी समाज में व्याप्त विषमताओं के सच का सामना कराने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में ले गए जहां अश्वेत पिता-पुत्र को नस्लभेदी समाज का जुल्म झेलना पड़ता है। अश्वेत पिता की हत्या हो जाती है और बेटा ‘महान अमेरिकी’ समाज को एक नए नजरिए से देखने लगता है।
‘मी’ की तुलना उस सीमा तक क्या हम अपने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कर सकते हैं, जिसमें नायक एक खुशफहम सपने का शिकार था? जो लोग अब तक भारत को निहायत निजी स्तर से एक तरह के आदर्शवादी चश्मे से देख रहे हैं, वे मान रहे हैं कि मौजूदा नोटबंदी की नीति का जो भी विरोध कर रहा है, वह बेईमान है।
आठ नवंबर की रात देश की 86 फीसद मुद्रा को चलन से बाहर कर पूरे देश से भ्रष्टाचार मिटाने का दिवास्वप्न दिखाया गया। लेकिन लगता है कि सपना दिखाने वाले ही सो गए हैं। यह ‘द सेलआउट’ के ‘मी’ का सपना है। इस कहानी की विडंबना यह है कि इसमें ‘मी’ की आंखें खोलने वाले पिता की तरह इनकी आंखें खोलने की राह बताने वाला कोई नहीं दिख रहा है? कम से कम इनके ‘अपनों’ में से तो कोई नहीं। कोई भी यह देख सकता है कि इनके सारे ‘अपनों’ ने अपनी आंखें बंद कर ली हैं और वे वही देख रहे हैं, जो दिखाया नहीं, बताया जा रहा है!
भाजपा के शीर्ष नायक से लेकर छोटे नेता तक इस मसले पर इतने असमंजस में हैं कि उन्हें इसे सही ठहराने के लिए ‘राष्टÑवाद’ के अलावा अब तक कोई जुमला नहीं मिला है। हां, इस बीच भाजपा की एक साध्वी मंत्री ने नरेंद्र मोदी की तुलना कार्ल मार्क्स से जरूर कर दी थी। तो यह है नोटबंदी जैसे बेमानी साबित होते सख्त फैसले को लेकर भाजपा नेताओं की दूरदृष्टि। कोई कम उपभोग बनाम साम्यवादी समाज की बात कर रहा है तो कोई नोटबंदी का झंडा उठाए सीमा पर खड़े सैनिकों का हवाला देकर अपनी पीड़ा का बयान करने वालों का मुंह बंद करा देने में जुटा हैं। जनता को देशप्रेम के लड्डू में राष्टÑवाद का अफीम मिला कर सुलाने की कोशिश की जा रही है।
नोटबंदी पर तो अफीम के लड्डू जनता आठ नवंबर की रात से ही खा रही है। पहले दिन इसे शुद्धीकरण से जोड़ा गया, कालेधन के खिलाफ ‘महायज्ञ’ से लेकर ‘धमर्युद्ध’ तक कहा गया। गृह मंत्रालय की ओर से बयान आया कि नोटबंदी के बाद कश्मीर में पत्थर बरसने बंद हो गए… नक्सलियों के हौसले पस्त हैं… पाकिस्तान रो रहा है। मतलब यह कि अगर किसी ने नोटबंदी का विरोध किया तो ये जुमले इस तरह सामने रख दिए जाएंगे कि वह अपराधबोध से ग्रस्त हो जाए। एक खास लहजे में कहा जाएगा कि आप पाकिस्तानपरस्त नहीं हैं, बुरहान वानी के प्रशंसक नहीं हैं और स्टालिनवादी भी नहीं हैं, तो फिर आप नोटबंदी के खिलाफ कैसे हो सकते हैं?
नोटबंदी के लड्डू ने जनता को कैसा स्वाद दिया, वह तो यह बता ही देगी, लेकिन सच है कि इससे शायद सरकार को अपनी कड़वाहट कम करने का मौका मिला। बहुमत वाली सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके थे और किसी भी क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय हासिल नहीं दिख रहा था। पंजाब और उत्तर प्रदेश से भी जमीनी रिपोर्ट बहुत अच्छी नहीं थी कि आप चुनाव जीत ही जाएंगे। अपनी नाकामियों का ठीकरा मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी पर आखिर कब तक फोड़ा जाता!
सवाल दबाने के तमाम इंतजामों के बावजूद लोग पूछने लगे थे कि बदलने के दावे के बीच देश किसके लिए बदल रहा है! सवाल आक्रोश में तब्दील होने लगा था और अचानक आठ नवंबर की शाम के उस एलान के साथ ही नरेंद्र मोदी ने सारे राजनीतिक दलों का एजंडा हड़प लिया। पांच सौ और हजारी नोट को बंद कर देश में बन और बह रहे विचार की दिशा ही बदल दी। अब सरकार से यह सवाल कहां है कि पिछले एक महीने में पार्टी या सरकार ने शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में क्या किया? संघ के हिंदुत्व के एजंडे का क्या हुआ? राष्टÑगान पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर कोई चर्चा नहीं। मंत्रिमंडल की बैठक में ‘फॉलोअर्स’ (सोशल मीडिया) की गिनती हुई या नहीं? पंजाब यात्रा के दौरान मोदी और उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल के बीच कोई तकरार हुई तो क्यों? नोटबंदी के परदे में शायद सारे सवाल दफ्न हो गए या फिर चुपचाप पल और चल रहे हैं।
साधारण लोगों की तस्वीर के साथ विपक्ष संसद के अंदर और बाहर ताकता और कराहता रहा। इससे पहले इस सरकार के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं आया था जो इतने दिनों तक सुर्खियां बटोरता रहा हो और सरकार खुद-ब-खुद इसके हल होने का इंतजार करती रही हो। एक सहजता को गुत्थी में उलझा देने के बाद उसके खुद-ब-खुद सुलझ जाने की उम्मीद..!
लेकिन सच है कि यह मामला हल होता दिख नहीं रहा है। यह तो हो ही नहीं सकता कि प्रधानमंत्री को आठ नवंबर के पहले कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैली सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की जानकारी नहीं थी। या वे यहां की बैंकिंग व्यवस्था की खामियों से अनजान थे। इसके बावजूद देश के आम आदमी के नोटों पर पहरा लगा कर भ्रष्टाचार मिटाने का दिवास्वप्न जो उन्होंने देखा, उन्हें नींद से जगाएगा कौन? कौन उन्हें बताएगा कि बिना तंत्र सुधारे एटीएम और बैंकों पर आम लोगों के पैसों की तालाबंदी कर वे समाज का किसी भी तरह से भला नहीं कर रहे हैं? जिसे निशाना बनाने का ढोल जोर-शोर से पीटा गया, क्या सचमुच उन्हें कोई तकलीफ हुई?
माकपा नेता प्रकाश कारत ने हाल ही में अपने एक बहुचर्चित लेख में लिखा था कि भाजपा अभी एक फासीवादी पार्टी नहीं है, हां उसमें फासीवादी होने की प्रवृत्ति दिखती है। मेरा भी यही मानना है कि फासीवादी प्रवृत्ति से फासीवादी होने का इलाज भी इसी जनतंत्र में है। कम से कम संविधान के पन्नों पर अभी हमारे अधिकार सुरक्षित हैं और आप अपने आदेशों को संविधान की वैधानिकता का ओढ़ना ओढ़ कर ही जायज ठहराते हैं। हम अपनी-अपनी तरह से संविधान की व्याख्या कर तो रहे हैं। संविधान की शपथ लेकर राज करने वालों की प्राथमिकता में संविधान के पन्नों पर दर्ज अक्षर-अक्षर को लागू करने की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
मेरा यही मानना है कि प्रधानमंत्री संविधान और लोकतांत्रिक रवायतों में यकीन रखते हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि एक्सिस बैंक जैसे निजी बैंकों को देश की गाढ़ी कमाई की पहरेदारी का हक सौंप कर आपने इस ‘महायज्ञ’ के लिए सहकारी बैंकों को क्यों ‘अछूत’ बना कर छोड़ दिया? ग्रामीणों का सहकारी बैंकों से भरोसा उठा कर कई राज्यों को वित्तीय अराजकता की मंझधार में क्यों छोड़ दिया? कारखानों में नोटबंदी के बाद जो कामबंदी जैसे हालात आ गए और दिल्ली जैसे महानगरों में रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभा रहे श्रमिक वर्ग जब उलटा पलायन (रिवर्स माइग्रेशन) कर रहे हैं, भारी तादाद में मजदूरों के बेरोजगार हो जाने के बाद भूखे रहने की नौबत आ गई है तो आपने इनके लिए क्या सोचा है?
मेरा सवाल है कि अगर नोटबंदी के बाद मंडप पर बैठी लड़कियों के अभिभावकों की हृदयाघात से मौत हो रही थी तो नितिन गडकरी की बेटी की शादी में कैसे करोड़ों खर्च हुए। हम यह मान लेते हैं कि उनके पास करोड़ों का उजला धन होगा। वे अपने इस धन का ब्योरा तो हम आम जनता के पास रख सकते हैं? हम प्रधानमंत्री की देशभक्ति पर सवाल उठाने की कूव्वत नहीं रखते। उनसे सवाल पूछा जा सकता है, लेकिन उनकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं। उनके इस फैसले से देश पर जाने-अनजाने क्या असर पड़ा इस पर भी सवाल हो सकता है। फिलहाल फैसले के पीछे की उनकी नीयत पर शक करना अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना होगा। हम बात आगे की कर रहे हैं।
समय है कि वे अपने साथियों को भी शुचिता का पाठ पढ़ाएं। तीन महानुभावों नितिन गडकरी, महेश शर्मा और जनार्दन रेड्डी के घरों में हुई शादियों पर विवाद है। मोदी इस समय पार्टी व अपने मूल संगठन में भी कद्दावर हैं। उनकी जुबान से निकला शब्द ही आदेश है। अगर ये तीनों जनता के सामने अपनी सच्चाई पेश करते हैं तो सबसे खुश आम जनता होगी। वही आम जनता जिसके बारे में पाश की पंक्तियां उधार लेकर कहता हूं, ‘मैं घास हूं/मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा’।

शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

वर्चस्व का मानस

वर्चस्व का मानस
प्रभुत्व की मानसिकता इंसान को किस कदर संवेदनहीन और आपराधिक बना डालती है उसके उदाहरण हमें अक्सर मिलते रहते हैं। लेकिन पिछले दिनों महिलाओं के खिलाफ हुई कुछ घटनाओं ने मुझे भीतर से झकझोर दिया। ये घटनाएं अपनी पूरी तीव्रता के साथ टीवी चैनलों और अखबारों की सुर्खियां भी बनीं लेकिन उसमें अपनी.अपनी जिम्मेदारी की तलाश नहीं गई। पहली घटना में राजधानी दिल्ली के बुराड़ी इलाके में एक इक्कीस साल के लड़के ने बेरहमी से कैंची के लगातार वार से लड़की की हत्या कर दी। इसी तरह गुड़गांव के एक मेट्रो स्टेशन पर एकतरफा प्यार में पागल एक युवक ने महिला के इनकार करने पर सरेआम चाकू से वार कर उसकी हत्या कर दी। एक अन्य घटना में राजस्थान के अलवर जिले में बेहद क्रूर तरीके से एक महिला की हत्या का मामला सामने आया। युवक ने अपनी पत्नी के चरित्र पर शक के कारण मिट्टी का तेल डाल कर जिंदा जला दिया और फिर चाकू से उसके अंगों के टुकड़े कर शहर के विभिन्न हिस्सों में फेंक दिए।
महिलाओं पर हमले की खबरें आए दिन सुर्खियां बनती रहती हैं। हर रोज महिलाओं को छेड़छाड़ पिटाई अपमान यौन शोषण जैसी हिंसात्मक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। कई बार उनके जीवन साथी या परिवार के सदस्य भी उनकी हत्या कर देते हैं। ज्यादातर घटनाओं के बारे में तो पता ही नहीं चलता है क्योंकि कमजोर पृष्ठभूमि की शोषित और प्रताड़ित महिलाएं किसी को इसके बारे में बताने से घबराती हैं। उन्हें डर लगता है कि कहीं ये पितृसत्तात्मक और सामंती मानस वाला समाज उन्हें ही दोषी ठहरा कर और ज्यादा नुकसान न पहुंचाए। मेरे संपर्क की एक महिला ने अपना दुख इन शब्दों में जाहिर किया. आज हालात ये हैं कि घरए समाज में महिलाओं के लिए डर ही उनकी एक ऐसी सखी है जो हर पल उनके साथ रहती है और हिंसा एक ऐसा खतरनाक अजनबी है जो किसी भी वक्तए किसी भी मोड़ सड़क या आम जगह पर उन्हें धर.दबोच सकता है।
सवाल है कि आखिर कोई पुरुष महिला के प्रति इतना हिंसक क्यों हो जाता है। खासतौर पर महिला के महज इनकार करने भर से पुरुष हमलावर क्यों हो जाता है! कोई भी पुरुष महिला को चोट पहुंचाने के लिए अनेक बहाने बना सकता है। मसलनए वह शराब के नशे में था वह अपना आपा खो बैठा या फिर वह महिला इसी लायक है आदि। लेकिन सच यह है कि पुरुष हिंसा का रास्ता केवल इसलिए अपनाता है क्योंकि वह केवल इस माध्यम से वह सब प्राप्त कर सकता है जिन्हें वह एक पुरुष होने के कारण अपना हक समझता है। इस घातक मानसिकता का ही परिणाम है कि महिलाओं के खिलाफ छेड़छाड़ बलात्कार दहेज हत्या और यौन हिंसा जैसे अपराधों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। यह स्थिति तब है जब देश में महिलाओं को अपराधों के विरुद्ध कानूनी संरक्षण हासिल है।
विडंबना यह है कि समाज में स्वतंत्रता और आधुनिकता के विस्तार के साथ.साथ महिलाओं के प्रति संकीर्णता का भाव भी बढ़ा है। प्राचीन सामाज में ही नहीं बल्कि आधुनिक समाज की दृष्टि में भी महिलाएं केवल वस्तु हैं जिसको थोपी और गढ़ी.बुनी गई तथाकथित नैतिकता की परिधि से बाहर नहीं आना चाहिए। महिलाओं के खिलाफ हिंसा के उन्मूलन पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा पत्र के मुताबिकए ष्महिलाओं के प्रति हिंसा पुरुषों और महिलाओं के बीच ऐतिहासिक शक्ति की असमानता का प्रकटीकरण हैष् और हिलाओं के प्रति हिंसा एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा महिलाएं पुरुषों की अपेक्षा कमतर स्थिति में धकेल दी जाती हैं।ष् संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव कोफी अन्नान ने कहा था ष्दुनिया के कोने.कोने में महिलाओं के खिलाफ हिंसा की जा रही है। हर समाज और हर संस्कृति की महिलाएं इस जुल्म की शिकार हो रही हैं। वे चाहे किसी भी जातिए राष्ट्रए समाज या तबके की क्यों न हों या उनका जन्म चाहे जहां भी हुआ हो वे हिंसा से अछूती नहीं हैं।
मैंने समाज में पुरुषों और महिलाओं के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्दों पर गौर किया तो यही लगा कि पुरुष के लिए निडर मजबूत मर्द ताकतवर तगड़ा सत्ताधारी कठोर हृदय मूंछों वाला और महिलाओं के लिए कोमल बेचारी अबलाए घर बिगाड़ू कमजोर बदचलन झगड़ालू आदि शब्द प्रयोग किए जाते हैं। इनमें से कुछ शब्द तो महिला.पुरुष में प्राकृतिक अंतर के प्रतीक हैं लेकिन ज्यादातर शब्द प्राकृतिक कम सामाजिक ज्यादा हैं। यानी पितृसत्तात्मक समाज ने इन शब्दों और इसके पीछे की अवधारणा को गढ़ा है जबकि असलियत में ये शब्द केवल महिलाओं को कमजोर दिखाने के लिए ही प्रयोग किए जाते हैं। मैं अपने आसपास के अनुभवों के आधार पर कह सकता हूं कि केवल पुरुष ही नहीं बल्कि एक महिला भी बराबर के स्तर पर बुद्धिमान ताकतवर मजबूत और निडर होती है। बस दिक्कत यह है कि अब तक उससे परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीके से उसकी ताकत छीनी गई है।