बेबाक बोलः नगद नारायण कथा-अह्म ब्रह्मास्मि
सत्ता जब ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह बात करने लगे कि हमें जो ठीक लगे वही करेंगे तो लोकतंत्र का आधार बनी आम जनता के पांव लड़खड़ाने लगते हैं।
आम जनता बनाम सत्ता के रिश्ते को पाश की पंक्तियां उधार लेकर बोलें तो जनता घास की तरह होती है और सत्ता के हर किए-धरे पर उग ही आएगी। लेकिन सत्ता जब ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ की तरह बात करने लगे कि हमें जो ठीक लगे वही करेंगे तो लोकतंत्र का आधार बनी आम जनता के पांव लड़खड़ाने लगते हैं। ज्यां द्रेज ने नोटबंदी से कालेधन पर काबू पाने की कवायद की तुलना खुले झरने के नीचे पोछा लगाने से की है। आज 40वें दिन भी हालात सुधार के नाम पर बस डिजिटल भुगतान की ही सलाह है। नोटबंदी से परेशान जनता और फैसले को जायज बता रही तटस्थ सरकार पर इस बार का बेबाक बोल।
इस साल मैन बुकर प्राइज से पुरस्कृत पॉल बेट्टी की किताब ‘द सेलआउट’ के नायक ‘मी’ को इस बात की खुशफहमी रहती है कि अमेरिकी समाज सबको जीने के लिए समान अवसर उपलब्ध कराता है। नायक को लगता है कि महान अमेरिकी गणराज्य में महज अपनी काबिलियत के जरिए हर आम इनसान अपने सपने पूरे कर सकता है। ‘मी’ के अश्वेत पिता नहीं चाहते थे कि उनका बेटा झूठे सपनों में और भ्रांतियों का शिकार होकर जिए। पिता अपने बेटे को अमेरिकी समाज में व्याप्त विषमताओं के सच का सामना कराने के लिए देश के अलग-अलग हिस्सों में ले गए जहां अश्वेत पिता-पुत्र को नस्लभेदी समाज का जुल्म झेलना पड़ता है। अश्वेत पिता की हत्या हो जाती है और बेटा ‘महान अमेरिकी’ समाज को एक नए नजरिए से देखने लगता है।
‘मी’ की तुलना उस सीमा तक क्या हम अपने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कर सकते हैं, जिसमें नायक एक खुशफहम सपने का शिकार था? जो लोग अब तक भारत को निहायत निजी स्तर से एक तरह के आदर्शवादी चश्मे से देख रहे हैं, वे मान रहे हैं कि मौजूदा नोटबंदी की नीति का जो भी विरोध कर रहा है, वह बेईमान है।
आठ नवंबर की रात देश की 86 फीसद मुद्रा को चलन से बाहर कर पूरे देश से भ्रष्टाचार मिटाने का दिवास्वप्न दिखाया गया। लेकिन लगता है कि सपना दिखाने वाले ही सो गए हैं। यह ‘द सेलआउट’ के ‘मी’ का सपना है। इस कहानी की विडंबना यह है कि इसमें ‘मी’ की आंखें खोलने वाले पिता की तरह इनकी आंखें खोलने की राह बताने वाला कोई नहीं दिख रहा है? कम से कम इनके ‘अपनों’ में से तो कोई नहीं। कोई भी यह देख सकता है कि इनके सारे ‘अपनों’ ने अपनी आंखें बंद कर ली हैं और वे वही देख रहे हैं, जो दिखाया नहीं, बताया जा रहा है!
भाजपा के शीर्ष नायक से लेकर छोटे नेता तक इस मसले पर इतने असमंजस में हैं कि उन्हें इसे सही ठहराने के लिए ‘राष्टÑवाद’ के अलावा अब तक कोई जुमला नहीं मिला है। हां, इस बीच भाजपा की एक साध्वी मंत्री ने नरेंद्र मोदी की तुलना कार्ल मार्क्स से जरूर कर दी थी। तो यह है नोटबंदी जैसे बेमानी साबित होते सख्त फैसले को लेकर भाजपा नेताओं की दूरदृष्टि। कोई कम उपभोग बनाम साम्यवादी समाज की बात कर रहा है तो कोई नोटबंदी का झंडा उठाए सीमा पर खड़े सैनिकों का हवाला देकर अपनी पीड़ा का बयान करने वालों का मुंह बंद करा देने में जुटा हैं। जनता को देशप्रेम के लड्डू में राष्टÑवाद का अफीम मिला कर सुलाने की कोशिश की जा रही है।
नोटबंदी पर तो अफीम के लड्डू जनता आठ नवंबर की रात से ही खा रही है। पहले दिन इसे शुद्धीकरण से जोड़ा गया, कालेधन के खिलाफ ‘महायज्ञ’ से लेकर ‘धमर्युद्ध’ तक कहा गया। गृह मंत्रालय की ओर से बयान आया कि नोटबंदी के बाद कश्मीर में पत्थर बरसने बंद हो गए… नक्सलियों के हौसले पस्त हैं… पाकिस्तान रो रहा है। मतलब यह कि अगर किसी ने नोटबंदी का विरोध किया तो ये जुमले इस तरह सामने रख दिए जाएंगे कि वह अपराधबोध से ग्रस्त हो जाए। एक खास लहजे में कहा जाएगा कि आप पाकिस्तानपरस्त नहीं हैं, बुरहान वानी के प्रशंसक नहीं हैं और स्टालिनवादी भी नहीं हैं, तो फिर आप नोटबंदी के खिलाफ कैसे हो सकते हैं?
नोटबंदी के लड्डू ने जनता को कैसा स्वाद दिया, वह तो यह बता ही देगी, लेकिन सच है कि इससे शायद सरकार को अपनी कड़वाहट कम करने का मौका मिला। बहुमत वाली सरकार के ढाई साल पूरे हो चुके थे और किसी भी क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय हासिल नहीं दिख रहा था। पंजाब और उत्तर प्रदेश से भी जमीनी रिपोर्ट बहुत अच्छी नहीं थी कि आप चुनाव जीत ही जाएंगे। अपनी नाकामियों का ठीकरा मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी पर आखिर कब तक फोड़ा जाता!
सवाल दबाने के तमाम इंतजामों के बावजूद लोग पूछने लगे थे कि बदलने के दावे के बीच देश किसके लिए बदल रहा है! सवाल आक्रोश में तब्दील होने लगा था और अचानक आठ नवंबर की शाम के उस एलान के साथ ही नरेंद्र मोदी ने सारे राजनीतिक दलों का एजंडा हड़प लिया। पांच सौ और हजारी नोट को बंद कर देश में बन और बह रहे विचार की दिशा ही बदल दी। अब सरकार से यह सवाल कहां है कि पिछले एक महीने में पार्टी या सरकार ने शिक्षा के भगवाकरण की दिशा में क्या किया? संघ के हिंदुत्व के एजंडे का क्या हुआ? राष्टÑगान पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर कोई चर्चा नहीं। मंत्रिमंडल की बैठक में ‘फॉलोअर्स’ (सोशल मीडिया) की गिनती हुई या नहीं? पंजाब यात्रा के दौरान मोदी और उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल के बीच कोई तकरार हुई तो क्यों? नोटबंदी के परदे में शायद सारे सवाल दफ्न हो गए या फिर चुपचाप पल और चल रहे हैं।
साधारण लोगों की तस्वीर के साथ विपक्ष संसद के अंदर और बाहर ताकता और कराहता रहा। इससे पहले इस सरकार के पास ऐसा कोई मुद्दा नहीं आया था जो इतने दिनों तक सुर्खियां बटोरता रहा हो और सरकार खुद-ब-खुद इसके हल होने का इंतजार करती रही हो। एक सहजता को गुत्थी में उलझा देने के बाद उसके खुद-ब-खुद सुलझ जाने की उम्मीद..!
लेकिन सच है कि यह मामला हल होता दिख नहीं रहा है। यह तो हो ही नहीं सकता कि प्रधानमंत्री को आठ नवंबर के पहले कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैली सामाजिक और आर्थिक विषमताओं की जानकारी नहीं थी। या वे यहां की बैंकिंग व्यवस्था की खामियों से अनजान थे। इसके बावजूद देश के आम आदमी के नोटों पर पहरा लगा कर भ्रष्टाचार मिटाने का दिवास्वप्न जो उन्होंने देखा, उन्हें नींद से जगाएगा कौन? कौन उन्हें बताएगा कि बिना तंत्र सुधारे एटीएम और बैंकों पर आम लोगों के पैसों की तालाबंदी कर वे समाज का किसी भी तरह से भला नहीं कर रहे हैं? जिसे निशाना बनाने का ढोल जोर-शोर से पीटा गया, क्या सचमुच उन्हें कोई तकलीफ हुई?
माकपा नेता प्रकाश कारत ने हाल ही में अपने एक बहुचर्चित लेख में लिखा था कि भाजपा अभी एक फासीवादी पार्टी नहीं है, हां उसमें फासीवादी होने की प्रवृत्ति दिखती है। मेरा भी यही मानना है कि फासीवादी प्रवृत्ति से फासीवादी होने का इलाज भी इसी जनतंत्र में है। कम से कम संविधान के पन्नों पर अभी हमारे अधिकार सुरक्षित हैं और आप अपने आदेशों को संविधान की वैधानिकता का ओढ़ना ओढ़ कर ही जायज ठहराते हैं। हम अपनी-अपनी तरह से संविधान की व्याख्या कर तो रहे हैं। संविधान की शपथ लेकर राज करने वालों की प्राथमिकता में संविधान के पन्नों पर दर्ज अक्षर-अक्षर को लागू करने की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
मेरा यही मानना है कि प्रधानमंत्री संविधान और लोकतांत्रिक रवायतों में यकीन रखते हैं। मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि एक्सिस बैंक जैसे निजी बैंकों को देश की गाढ़ी कमाई की पहरेदारी का हक सौंप कर आपने इस ‘महायज्ञ’ के लिए सहकारी बैंकों को क्यों ‘अछूत’ बना कर छोड़ दिया? ग्रामीणों का सहकारी बैंकों से भरोसा उठा कर कई राज्यों को वित्तीय अराजकता की मंझधार में क्यों छोड़ दिया? कारखानों में नोटबंदी के बाद जो कामबंदी जैसे हालात आ गए और दिल्ली जैसे महानगरों में रीढ़ की हड्डी की भूमिका निभा रहे श्रमिक वर्ग जब उलटा पलायन (रिवर्स माइग्रेशन) कर रहे हैं, भारी तादाद में मजदूरों के बेरोजगार हो जाने के बाद भूखे रहने की नौबत आ गई है तो आपने इनके लिए क्या सोचा है?
मेरा सवाल है कि अगर नोटबंदी के बाद मंडप पर बैठी लड़कियों के अभिभावकों की हृदयाघात से मौत हो रही थी तो नितिन गडकरी की बेटी की शादी में कैसे करोड़ों खर्च हुए। हम यह मान लेते हैं कि उनके पास करोड़ों का उजला धन होगा। वे अपने इस धन का ब्योरा तो हम आम जनता के पास रख सकते हैं? हम प्रधानमंत्री की देशभक्ति पर सवाल उठाने की कूव्वत नहीं रखते। उनसे सवाल पूछा जा सकता है, लेकिन उनकी देशभक्ति पर कोई सवाल नहीं। उनके इस फैसले से देश पर जाने-अनजाने क्या असर पड़ा इस पर भी सवाल हो सकता है। फिलहाल फैसले के पीछे की उनकी नीयत पर शक करना अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना होगा। हम बात आगे की कर रहे हैं।
समय है कि वे अपने साथियों को भी शुचिता का पाठ पढ़ाएं। तीन महानुभावों नितिन गडकरी, महेश शर्मा और जनार्दन रेड्डी के घरों में हुई शादियों पर विवाद है। मोदी इस समय पार्टी व अपने मूल संगठन में भी कद्दावर हैं। उनकी जुबान से निकला शब्द ही आदेश है। अगर ये तीनों जनता के सामने अपनी सच्चाई पेश करते हैं तो सबसे खुश आम जनता होगी। वही आम जनता जिसके बारे में पाश की पंक्तियां उधार लेकर कहता हूं, ‘मैं घास हूं/मैं आपके हर किए-धरे पर उग आऊंगा’।
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