शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

पुस्तक पढ़ना

पुस्तक पढ़ना
उन्होंने महीनों पहले एक पुस्तक खरीदी थी। सोचा था पढ़ेंगे पर पढ़ नहीं पाए। ऐसा हमेशा होता है। हम किताबें पढ़ नहीं पाते चाहकर भी नहीं। कहां तो किताबें पढ़ने की आदत होनी चाहिए पर न पढ़ने की आदत बन गई है।
दरअसल पढ़ने को मजबूरी और सुरक्षित आर्थिक जीवन का एक जरिया भर मानकर देखा जाता है जबकि दुनिया के ज्यादातर बदलाव वाया पुस्तक ही आते हैं। मशहूर साहित्यकार फ्रेंज काफ्का कहते थे अच्छी पुस्तकें कुल्हाड़े की तरह हमारे अंदर जमे हुए बर्फ के दरिया को तोड़ देने की क्षमता रखती हैं। इनके जरिये बदलाव की शुरुआत होती है। हम तो यह समझते हैं कि हमने बहुत पढ़ लिया। मगर जिस तरह हम रोजाना घर की सफाई के लिए झाड़ू देते हैंए वैसे ही आंखों और मन के ऊपर जमी धूल को झाड़ने के लिए पुस्तकें पढ़ने में एक निरंतरता चाहिए। हम कह सकते हैं कि हमारे पास समय कहां लेकिन यह एक शानदार झूठ है। हम टीवी देखते हैं गप्पें लड़ाते हैं छुट्टियां मनाते हैं पर पुस्तकें नहीं पढ़ते।
द ट्रैजडी ऑफ मिस्टर मॉर्न और लाफ्टर इन द डार्क जैसी पुस्तक को लिखने वाले व्लादिमीर नबोकोव कहते हैं आप समय को लेकर परेशान न होंए बस पढ़ते जाएं। इससे बेहतर तरीके से आप समय को कहीं और खर्च नहीं कर सकते। मनुष्यता और पशुता के बीच का अंतर पुस्तकें ही हैं। महात्मा गांधी ने भी पुस्तकों को बदलाव का खास जरिया माना। उनसे एक बार किसी ने पूछा कि रामायण को सही माना जाए या नहीं इस पर उनका जवाब था. मैं इसे सही या गलत नहीं कह सकता मगर इतना जरूर कह सकता हूं कि इसे पढ़ने से मैं सही हो गया। चाहो तो तुम भी आजमा सकते हो।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें