शुक्रवार, 16 दिसंबर 2016

हाशिये पर अदृश्य हो गए लोग

हाशिये पर अदृश्य हो गए लोग
 हमारे लोकतंत्र में राजनीतिक दलों की जीत या हार की संभावना का अनुमान राजनीतिक विश्लेषक या मीडिया आमतौर पर इस आधार पर लगाता है कि किस दल के ष्बेस वोटष् से जुड़ी जातियों की संख्या किस क्षेत्र में कितना प्रतिशत है। आमतौर पर ऐसे विश्लेषणों में जातियों और समुदायों को एक ष्होमोजीनियस वोट बैंक के रूप में देखा जाता हैए जो वे अक्सर नहीं होती हैं। एक ही समुदाय के भीतर कई तरह की चीजें काम करती हैं और लोग अलग.अलग तरह से वोट डालते हैं। कई बार अस्मिता की उग्र चाह और सत्ता में भागीदारी की आकांक्षा के कारण दलितों और पिछड़ों में प्रभावी जातियों की एक बड़ी संख्या एक साथ किसी एक पार्टी के पक्ष में वोट करती हैंए लेकिन उनमें ही छोटी संख्या वाली अति उपेक्षित और अति पिछड़ी अनेक जातियांए जो ज्यादातर बिखरी हुई होती हैंए अलग.अलग कारणों से अलग वोट करती हैं।

उत्तर प्रदेश के संदर्भ में अगर देखेंए तो दलितों की आबादी 21 प्रतिशत हैए जिन्हें राजनीतिक व्याख्या में अक्सर बहुजन समाज पार्टी का ष्बेस वोटष् माना जाता है। लेकिन अगर जमीनी सच्चाई को समझने का प्रयास करेंए तो इनमें जाटव जाति ही बसपा का बेस वोट हैए पासी धोबी कोरी खटिक भी कई बार दलित वोट बैंक या ष्बहुजनिया वोटष् के रूप में इसके पक्ष में मतदान करते दिखाई पड़ते हैं। किंतु उत्तर प्रदेश में लगभग 55 से ज्यादा छोटी संख्या वाली दलित जातियां इधर.उधर बिखरी हुई हैं और किसी अदृश्य समुदाय की तरह हैं। वे स्थानीय स्तर पर प्रभावी दलित पिछड़ी और सवर्ण जातियों के प्रभाव में वोट करती दिखती हैं। इनमें बसोड़ए सपेरे कुच बघिया मुसहर बेगार ततवां रंगरेज सरवन जैसी जातियां हैं।

इनके बारे में कई बार राजनीतिक पार्टियों को या तो पता नहीं होता या पता होने के बावजूद उनकी छोटी व बिखरी हुई जनसंख्या के कारण मतशक्ति को जिताऊ न मानते हुए वे उन पर ज्यादा जोर नहीं देतीं। ये जातियां ज्यादातर दस.बीस घर वाली छोटी बस्तियों में बसी होती हैं या बड़ी बहुजातीय बस्तियों में महज दो.तीन घरों में पाई जाती हैं। पंचायत चुनाव जैसे छोटे चुनाव में इनके वोट अक्सर महत्वपूर्ण हो जाते हैंए पर विधानसभा व लोकसभा के चुनावों में राजनीतिक दल इनको बहुत महत्वपूर्ण नहीं मानते। बसपा जैसी दलित व बहुजन की राजनीति करने वाली पार्टी भी इन्हें लेकर अक्सर अश्वस्त रहती हैंए यानी ष्टेकन फॉर ग्रांटेडष् लेते हुए इन्हें अपने राजनीतिक अभियान में ज्यादा महत्व नहीं देतीं। न इन जातियों के उम्मीदवारों को टिकट दिया जाता हैए न ही इन्हें राजनीतिक सहभागिता दी जाती है।

ऐसी जातियां भारतीय लोकतंत्र में ष्अदृश्य सामाजिक समूहष् के रूप में जी रही होती हैं। आज भारतीय आजादी के लगभग 70 वर्ष बाद भी न तो ये हमारी राजनीतिक समाज का हिस्सा बन पाई हैं और न ही इन्हें ष्सबॉल्टर्न सिटिजनष् के रूप में पहचान मिली है। ये दलित और बहुजन तो हैंए पर दलित और बहुजन के नाम पर हो रही राजनीति में न के बराबर हैं। सरकार के जरिये संसाधनों और कल्याणकारी योजनाओं का जो वितरण गरीब व पिछड़े समूहों में किया जा रहा हैए वह भी इन तक बूंद जितना पहुंचता है। इन जातियों में न कोई इनका अपना राजनीतिक नेतृत्व उभरा हैए और न ही किसी अन्य राजनीतिक दल ने इन्हें अपने नेतृत्व में जगह दी है। इनके बीच शिक्षा न के बराबर पहुंची है। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर इन समूहों के लोग अपनी राजनीति नहीं विकसित कर पा रहेए क्योंकि राजनीति के लिए जाति और समुदाय में आर्थिक रूप से एक सबल समूह का उभरना जरूरी है।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने इनके बीच काम शुरू किया है। गोरखपुर से बहराइच तक फैले उत्तर प्रदेश.नेपाल सीमा के गांवोंए वाराणसी के आस.पास के कुछ क्षेत्रों और अवध क्षेत्र में संघ अपने समरसता कार्यक्रमों को इन तक फैला रहा है। इनकी बस्तियों की सफाई इनके साथ संघ कार्यकर्ताओं का सहभोज इनकी बस्तियों में संघ संचालित प्राइमरी स्कूल जैसे कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। कई जगह तो इनकी बस्तियों से सटे तालाब के किनारे और बगीचों में संघ की शाखाएं भी लगने लगी हैं। संघ इनके बीच से कार्यकर्ता तैयार करने के प्रयास में लगा हैए जो आगे चलकर संघ का इनके साथ सतत संबंध बनाए रख सके। चीजें अगर इसी तरह से आगे बढ़ती रहींए तो भी एक लंबी प्रक्रिया के बाद ही इनके बीच से कोई नेतृत्व उभर सकेगा।

कांग्रेस भी ऐसी छोटी दलित जातियों को अपने से जोड़ना चाहती है। वह गैर.जाटव दलित जातियों को अपनी राजनीति में जगह देना चाहती है। लेकिन जहां उसे समझ में आता है कि इनकी जाति की वोट संख्या बहुत कम हैए और ये जिताऊ साबित नहीं होंगेए वहीं उनकी राजनीतिक भागीदारी सीमित कर दी जाती है। राजनीतिक दलों की चिंता उन्हें अपने साथ मतदाता के रूप में जोड़ने की तो रहती हैए मगर उनका अपना नेतृत्व विकसित होए उन्हें सत्ता में भागीदारी मिलेए ऐसी दीर्घकालीन योजना इस राजनीति में नहीं दिखती। बसपा के नेता यह कहते हैं कि हम इन्हें अपने साथ जोड़ते हैंए ये हमारे बहुजन समाज का हिस्सा हैंए पर बहुजन राजनीति में भी उन्हें भागीदारी देने का प्रयास न के बराबर दिखाई पड़ता है।

हमारी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि उसमें लोगों का राजनीतिक मूल्य उनकी जाति की संख्या और चुनाव में जीत पाने के उसके धन बल और बाहुबल से तय होता है। इसके कारण अब भी हमारा लोकतंत्र शक्तिवानों का खेल बनकर रह गया है। कांशीराम ने अपनी राजनीति की शुरुआत करते हुए यह सिद्धांत दिया था. ष्जिसकी जितनी संख्या भारीए उसकी उतनी हिस्सेदारीष्। इस सिद्धांत के चलते दलितों में जिन जातियों की संख्या ज्यादा हैए उन्हें तो राजनीतिक सहभागिता कुछ हद तक बहुजन राजनीति के विकास के बाद मिली हैए लेकिन उत्तर प्रदेश के समाज में निवास कर रहे इन 55 से ज्यादा छोटी संख्या वाली दलित व बहुजन जातियों का क्या होगाघ् इस सवाल का जवाब हमें आज नहीं तो कल देना ही होगा।

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